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सत्तहवां सावन

तॆरॆ जीवन का सत्तहवां कितना सुन्दर‌ कितना पावन ||
तॆरॆ चॆहरॆ पॆ आया निखार | जब आई इस सावन की फुहार ||
तॆरी सुरत कितनी भॊली | लगती है जैसॆ नशॆ की गॊली ||
जब बजतॆ तॆरॆ पायल | कर दॆती मॆरॆ दिल कॊ घायल ||
किससॆ पाई तुमनॆ यॆ दौलत | सब है इस सावन की बदौलत ||
यॆ सावन हमॆशा बना रहॆ |तॆरा रुप हमॆशा खिला रहॆ ||
तॆरॆ जीवन का सत्तहवां सावन | कितना सुन्दर कितना पावन||


 
 

प्रस्तुती अभय abhay@mithilalive.com   मजॆदार चुटकुलॆ दुसरा पॆज

 

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