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मच्छ्रर चलीशा
मदन कुमार ठाकुर

दोहा - आती आवश्यक जानी के होके आती लाचार
बरणो मच्छ्रर सकल गूउनो दुखा दायक ब्यबहार /
बिना मशहरी दिंन हू शुनहु शकल नर - नारी
मच्छार चालीस लिखो हू पढ़हो शोच बिचार //

चोपाई - जय मच्छार भगवान उजागर /
जय अगणित रोग के सागर //

नीम हकीम के तुम रखवारे /
डाक्टर को भी अतिशया प्यारे //

मलेरिया के तुम ह्ये दाता /
तुम खटमल के प्यारे भ्राता //

एक छत्र है राज तुमहरा /
करकट है तुमको अतिशया प्यारा //

हर दफ्तर मे आदर पाते /
बिना एजाजत तुम घुश जाते //

रूप - कुरूप ना तुम ने माना /
छौटा - बारा ना तुमने जाना //

भिन्न - भिन्न जो रोग सुनाते /
मदन कुमार भी तब शर्माते //

जय -जय मच्छार भगवना /
माफ करो सरा जुर्माना //

तुम हो नाथ साथ हम चेरा /
जल्दी उजरो अपना डेरा //

दोहा - निश् बंसा र शंकर कारंण
मलिन महा आती कूर /
अपने दल - बाल सहित तुम
बशो काही जा दूर //

(प्रेम से बोलो मच्छार भगवान की जय , रात्रि को सबको सेबा करने बाले की जय )

मदन कुमार ठाकुर (
<madanjagdamba@rediffmail.com>
कोठिया - पट्तीटॉल
झंझारपूर , मधुबनी , बिहार

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