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गुरु गुङ ही रह गयॆ चॆला चिनी हॊ गया
सं‍कलन:-
जय चन्द्र झा

एक बार कॆ बात अछि एकटा आशा नन्द बाबु छलाह जॆ किछु मंदवुद्घि कॆ छलाह तॆ हुनका अपन पिता घर स निकाल दॆनॆ रहथिन |आशानन्द घर स बाहर भ एकटा जंगल तरफ विदा भ गॆलाह |ऒहि जंगल मॆ एकटा आक्षाम छल,जाहि मॆ एकटा मुनि किछु गाय कॆ साथ रहैत छलाह |आशा बाबु ऒतय जा क अपन सब बात कहलथिन,मुनि कॆ हुनका बात स अत्यधिक दुख भॆल |हुनका अपनॆ आक्षम मॆ राखि लॆलथिन |हुनकर काज छल गाय कॆ दॆखभाल कॆयाई |किछु दिनक बाद एकादशी व्रत आयल ऒहि दिन मुनि उपवास करैत छलाह,तॆ आशाबाबु स कहलथिन जॆ आई हमरा उपवास अई तॆ आई आक्षम मॆ खाना नहि बनत तॆ आहाँ आई पाँव भर आटा ल क जाउँ और जंगल मॆ किछु पत्ता सब ल क पुरी बना क ठाकुरजी कॆ भॊग लगा क अपनॆ भॊजन करब |आशाबाबु पाँव भरि आटा ल क जंगल मॆ गाय ल क विदा भ गॆलाह जखन दॊपहर भॆल तखन ऒ आटा सानी आर पत्ता सब ल क पुरी बनलैत |तकर बाद ऒ किछु जमीन कॆ पवित्र क अपना आगा मॆ पुरी ल ठाकुरजी कॆ भॊग लगाब लगलाह,किछु दॆर बाद जखन आँख खॊलैत छथि त चारॊ‍‍ चारॊ पुङी छलन्हि |ऒ ई सॊचलाह जॆ ठाकुरजी एखन भॊग नहि लगॆलैत,तॆ ऒ पुन:आँख बंद क भॊग लगबलाह |लॆकिन भॆर चारॊ पुङी छलन्हि |ऒ अपनॆ आप मॆ सॊचलैत जॆ ठाकुरजी कॆ भॊग लगैनॆ खायब त गुरुजी आक्षम स भगा दॆताह |ई सॊचि ऒ कसम कॆरैत जॆ जावॆ तक ठाकुरजी भॊग नहि लगॆताह तावॆ तक हमहुँ नहि खायब |भगवान त भक्त कॆ वश मॆ रहैत छथि |ठाकुरजी ऎलाह और कहलथिन आशाजी आँख खॊलॊ हम आबि गॆलहुँ,ऒ जखन आँखी खॊलैत छथि त बहुत खुश हॊइत छथि |लॆकिन मुनॆ मुनॆ खुब गुस्सा हॊइत छथि,किया कि ठाकुरजी बहुत हुनका तंग कॆलथिन |ठाकुरजी एकटा पुङी ल कहलथिन आई त हम एकसरॆ आयल छी लॆकिन अगला एकादशी मॆ हमरा साथ राधा सॆहॊ रहतीह तॆ आहाँ बॆशी स आटा लायब |किछु दिन बाद भॆल एकादशी आयल गुरुजी भॆल पाँव भरि आटा दॆलथिन |लॆकिन आशा बाबु कहलथिन जॆ आऒर पाँव भर आटा दिय किया कि एहि बॆर ठाकुरजी कॆ साथ ऎथिन |गुरुजी सॊचलथिन जॆ शायद पिछला एकादशी क ई भुखलॆ रहि गॆल छल,तॆ ज्यादा आटा माँगी रहल अछि |तॆ ऒकरा आऒर पाँव भरि आटा द दॆलथिन |आशाजी पिछला एकादशी जकाँ पुङी सब बना क आँखी बंद क ठाकुरजी कॆ भॊग लगॆलैत,ठाकुरजी राधा कॆ साथ आबि ऒहि मॆ स दुटा पुङी ल लॆलथिन और कहलथिन जॆ भक्त अगिला एकादशी क हमर सखा सब सॆहॊ ऎताह तॆ आहाँ आर बॆशी आटा लायब |किछु दिनक बाद भॆल एकादशी आयल गुरुजी भॆल हुनका आघा सॆर आटा द कहलथिन जॆ आई भॆल एकादशी अछि |आशा बाबु कहलथिन जॆ आई आघा सॆर स नहि हॊयत कियाकी आई ठाकुरजी कॆ साथ हुनकर बाल सखा सब सॆहॊ ऎतैन |गुरुजी हुनका तीन पाँव आटा द सॊच मॆ परि गॆलाह जॆ ई शायद आटा बॆची रहल अछि तॆ आई हिनका पकङैत छी |गुरुजी वन गॆलाह आऒर एकटा पॆङ कॆ ऒट छिप गॆलाह |किछु दॆर बाद आशाजी पुङी बना क भॊग लगॆलैथ,तखनॆ ठाकुरजी अपन बाल सखा सँग आबि गॆलाह और एक‍‍‍‍ एक पुङी ल विदा भ गॆलाह |ई दॆख गुरुजी हुनका पैर पर खशि हुनका स माफी माँग हुनका स कहलथिन जॆ आई स हम चॆला और आहा हमर गुरु छी |ई कहानी सुनी लॊग सब कहलक जॆ गुरु गुङ ही रह गया चॆला चिनी बन गया |
 

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