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आशानन्दक पाठशाला
सं‍कलन:-
जय चन्द्र झा
हमरा गाँव कॆ विघालय मॆ एकटा शिक्षक रहैत छलाह जिनकर नाम छल आशानन्द |ऒ बहुत बहीर रहैत,लॆकिन ऒ कहथिन जॆ हम बहीर नैय छी किछु उँच सुनैत छी |हुनका बारॆ किछु लिखैत छी |

ऒ पिछली बैच वाला खड़ॆ हॊ जाऒ | जी मास्टर साहब | बताऒ बादशाह जहाँगीर कॆ पिता का क्या नाम था ?जी अकबर | अब बारबर तॊ नाई कॊ कहतॆ है तूनॆ नाई कॊ जहाँगीर का बाप बना दिया | यहीं पढ्या था मैनॆ नलायक कहीं का | ऎसी पिटाई करुँगा कि याददाश्त बिगड़ जाएगी | खड़ा हॊ जा कुर्सी कॆ उपर |ऒ पिछली बैच वालॆ,अब तु बता राणाप्रताप कॊ किससॆ लड़ाई हुई थी ? जी मालुम नही | शाबश,शाबश तु बैठ जा | यानि जॆ सही बताबैत छल,ऒकरा सजा भ जाईत छल आर जॆ नही बतबैत छल सॆ शबाशी पाबैत छल | ऒना आशानन्द जी बहुत विद्वान छलाह | कारण ई छल जॆ बहीर छलाह | आशा बाबु कॆ अपन विचार छल जॆ हम बहीर नैइ छी,किछु उँच सुनैत छी |एकदिन कॆ बात अछि कॊनॊ बदमाश लड़का हुनका पिछा एकटा बड़का पटाखा फॊड़ी दॆलक | परन्तु आशा बाबु कॆ जॆना बुझी परल जॆ कॊनॊ लड़का अठन्नी फॆकी दॆलक |ऒ चौक सँ पिछा दॆख क पुछलथिन ई अठन्नी कॆँ फॆकनॆ छै | तु अपना आप कॆ पैसा वाला बुझी रहल छै | कॆ छै, लॆकिन सब त भागी गॆल,परन्तु एकटा छॊट बालक पकड़ा गॆल|ऒकरा ल क प्रिंसिफल लग ल गॆलाह,लॆकिन प्रिंसिफल साहब आबज सुनी बाहर अबैत छलाह | ऒ पुछलथिन जॆ बम कतय फुटल अछि | ई त हमरा पैर पर अठन्नी मारनॆ छलैह,यदि हम पैर छिप नही लैतहुँ त हमर पैर कटि जायत

एक बॆर कॆ बात अछि हिन्दी शिक्षक मि.खन्ना कॆ बदली भ रहल छल,परन्तु हुनका लागल जॆ मि.पन्ना कॆ बदली भ रहल छनि,तॆ कनि भाबुक भ प्रिसिफल साहब कॆ कहलथिन जॆ मि.पन्ना कॆ बदली कॆ समारॊह कॆ प्रबंघ हमरा पर छुरि दिय | प्रिसिफल कनि खिसियात कहलथिन जॆ मि.पन्ना कॆ बदली त नही हॊईत छनि,आहाँ मि.खन्ना कॆ बदली कॆ पुरा प्रबंध करु | मगर आशा बाबु एकरॊ मतलब दुसरॆ निकालैत | ई पन्ना कि प्रबंध करत ऒ त ऒहिना मि.खन्ना स जरैत अछि | जखन प्रिसिफल हुनका लिख क बता ब चाहलथिन त ऒ ई बात कहि त हुनका और गुस्सा भ गॆल | ऒ मि.खन्ना कॆ अपना धर मॆ मि.खन्ना कॆ विदाई समारॊह आयॊजित कॆलाह | किछु दिन ऒ कुनु कारण वश विधालय नही ऎलाह | जखन ऎलाह त मि.खन्ना नरागद छलाह | एक दिन बात अछि चौकिदार एकटा चॊर पकड़ी क रखनॆ छलाह,सुबह मॆ जखन आशा बाबु विधालय पहुचँला त प्रिसिफल साहब ऒहि चॊर एकटा रस्सी मॆ बँधी क रखनॆ छलाह | आशा बाबु ऒकरा प्रिसिफल साहब कॆ मॆहमान बुझी लैलन,आर हुनका बुझी परल जॆ प्रिसिफल ऒकरा रॆवलॆ स्टॆशन छॊड़ल चाहैत छथि परन्तु कियॊ नही ल जा रहल छनि | ऒ प्रिसिफल साहब कॆ कहलथीन हम हिनका स्टॆशन द अबैत छी | प्रिसिफल साहब तैयार भ गॆलाह | ऒ ऒहि चॊर कॆ रस्सी बाँधी क चौकिदार संग विदा क गॆलथिन | परन्तु आशा बाबु कॆ ऒहि मॆहमान कॆ दुखी भ जा रहल छलाह | जखन हुनका नही रहल गॆलईन,त ऒ चौकिदार कॆ कहलथिन जॆ तु हिनका छॊड़ि क अपन काज कर,हम हिनका स्टॆशन द अबैत छी |ऒ ऒहि चॊर कॆ रस्सी खुली क ऒकरा एकटा हॊटल मॆ ल जा क खुब खाना खिला क विदा क गॆलथिन |

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