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तेनालीराम बना चित्रकार
सं‍कलन:-
जय चन्द्र झा
राजा ने एक नया महल बनवाया। उसमें एक प्रसिद्ध कलाकार से दीवारों पर बड़े सुंदर चित्र बनवाए। राजा अपने दरबारियों को वे चित्र दिखाने नए महल में ले गया। सबने उन चित्रों की जी भरकर प्रशंसा की, पर तेनालीराम चुप था।

अचानक उसने एक चित्र देखा, जिसमें एक व्यक्ति का एक ओर का चेहरा ही दिखाई देता था। उसने राजा से पूछा, ‘महाराज, इस व्यक्ति के चेहरे का दूसरा आधा भाग कहाँ है?’ ‘तुम भी अजीब मूर्ख हो!’ राजा ने हँसते हुए कहा, ‘दूसरे आधे भाग की कल्पना करनी पड़ती है।’ तेनालीराम चुप हो गया। कोई एक महीने बाद तेनालीराम ने राजा से कहा, ‘महाराज, मैं कई दिनों से बड़े परिश्रम से चित्र बनाना सीख रहा हूँ। मैंने कई अच्छे-अच्छे चित्रकारों को पीछे छोड़ दिया है।’ राजा बोले, ‘ऐसी बात है तो ठीक है। तुम मेरे भवन के दीवारों पर अपनी कला का चमत्कार दिखाओ।’ तेनालीराम ने बड़ी लगन के साथ यह काम किया। एक महीने के बाद उसने राजा से कहा कि वह दरबारियों के साथ आकर उसके चित्र देखें।

सब महल में पहुँचे। सब दीवारों पर शरीर के अलग-अलग अंगों के चित्र बने थे। कहीं हाथ, कहीं घुटने, कहीं कुहनी, जगह-जगह नाम, कान, आँखें, दाँत और मुँह बने थे। क्रोध में चिल्लाते हुए राजा ने पूछा, ‘यह सब क्या है? शरीर के दूसरे भाग साथ क्यों नहीं हैं?’ ‘उनकी कल्पना करनी पड़ती है महाराज!’गंभीर-सा मुँह बनाकर तेनालीराम ने कहा। राजा ने दो सिपाही बुलवाए। ये वही सिपाही थे, जिन्हें तेनालीराम ने कोड़ों का उपहार दिलवाया था। राजा ने हुक्म दिया, ‘ले जाओ इसे और इसका सिर धड़ से अलग कर दो। मैं तंग आ गया हूँ इस आदमी से। मेरा महल इसने बरबाद कर दिया है।’

सिपाही तेनालीराम को ले जाते हुए बहुत खुश थे। आज उससे बदला लेने का अवसर मिला था। तेनालीराम ने कहा, ‘मुझे मरना तो है ही, लेकिन आप लोगों की बड़ी कृपा होगी अगर आप मुझे मरने से पहले किसी तालाब में कमर तक पानी में खड़े होकर प्रार्थना करने दें, जिससे मैं स्वर्ग जा सकूँ।’ दोनों सिपाहियों ने सोचा, क्या हर्ज है। उन्होंने कहा, ‘ठीक है, पर कोई चालाकी करने की कोशिश मत करना।’ ‘आप मेरे दोनों ओर तलवार लेकर खड़े हो जाइए। मैं बचने की कोशिश करूँ तो बेशक मुझ पर वार कर दीजिए।’

सिपाहियों ने सोचा कि यह तो बहुत अच्छी योजना है। वे एक तालाब में तेनालीराम के दोनों ओर तलवारें निकालकर खड़े हो गए। कोई पौने घंटे के बाद तेनालीराम अचानक चिल्लाया-‘तलवार चलाओ।’ और झट से पानी में डुबकी लगा दी। घबराहट और जल्दी में सिपाहियों ने तलवारें चला दीं और एक-दूसरे के वार खाकर जान से हाथ धो बैठे। तेनालीराम राजा के पास पहुँचा। राजा का क्रोध तब तक ठंडा हो चुका था। हैरान होते हुए, पूछा, ‘तुम बच कैसे गए?’ ‘महाराज, उन मूर्खों ने मुझे मारने की बजाए एक-दूसरे को मार दिया।’ और तेनालीराम ने सारी कहानी कह सुनाई। ‘इस बार तो मैं तुम्हें क्षमा करता हूँ पर आगे से इस तरह की शरारतें नहीं होनी चाहिए।’
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