धर्मशास्र के क्षेत्र में महाकवि का योगदान (पूनम मिश्र)
धर्मशास्र के क्षेत्र में भी महाकवि विद्यापति का असाधारण
योगदान है। इस विषय पर इन्होने निम्नलिखित ७ ग्रन्थों की रचना की है:
(क) गंगावाक्यावली
(ख) दानवाक्यावली
(ग) वरिषकृत्य
(घ) दुर्गाभक्तितरंगिणी
(च) शैवसर्वस्वसार
(छ) गयापत्तालक और
(ज) विभागसार।
इन ग्रन्थों के सम्बन्ध में संक्षिपत जानकारी कुछ इस प्रकार है:
(क) गंगावक्यावली
इस ग्रन्थ में गंगानदी एवं इसके तट पर किये जाने वाले धार्मिक कृत्य या
कर्मकाण्डों की विस्तृत जानकारी है। गंगावाक्यावली ग्रन्थ की रचना महाकवि ने
रानी विश्वासदेवी की आज्ञा से की थी। इसमें गंगा नदी के स्मरण, कीर्तन से लेकर
गंगातट पर प्राणविसर्जन के महात्म्य का वर्णन किया गया है।
(ख) दानवाक्यावली
महाराजा नरसिंह दपंनारायण की पत्नी रानी धीरमती की आज्ञा से यह ग्रन्थ लिखा गया
है। इसमें सभी प्रकार के दानों का विधि-विधान विस्तार से दिया गया है और दान के
उपयुक्त देश, काल, पात्र का भी विशद विवेचन है।
(ग) वर्षकृत्य
विद्यापति ने एक सधे हुए धर्मशास्री के रुप में इस ग्रन्थ अर्थात् वर्षकृत्य
में वर्षभर में होने वाले पर्वों? तथा शुभ कार्यों का विस्तृत विधान प्रस्तुत
किया है। इसके अलावे इस ग्रन्थ में पूजा, अर्चना, व्रत, दान आदि के नियम भी
बतलाए गए हैं।
(घ) दुर्गाभक्तितरंगिणी
दुर्गाभक्तितरंगिणी ग्रन्थ को दुर्गोत्सव पद्धति के नाम से भी जाना जाता है। इस
ग्रेन्थ की रचना महाराज भैरवसिंह की आज्ञा से हुई थी। दुर्गाभक्तितरंगिणी में
मुख्यत: कालिकापुराण, देवीपुराण, भविष्यपुराण, ब्रह्मपुराण और मार्कण्डेय पुराण
से दुर्गापूजा की पद्धति के विषय में प्रमाणों का प्रकरणानुसार संग्रह किया गया
है। यह एक अनुपम ग्रन्थ है जो महाकवि विद्यापति ठाकुर का शक्ति के ऊपर अपार
श्रद्धा का परिचायक है।
(च) शैवसर्वस्वसार
यह ग्रन्थ महाराज पद्मसिंह की पत्नी विश्वासदेवी की आज्ञा से रचा गया था। महाकवि
विद्यापति ठाकुर ने इस ग्रन्थ में भगवान शिव की पूजा से सम्बन्धित सभी
विधि-विधानों का स्मा रीति से वर्णन किया है। इस ग्रन्थ को शम्भुवाक्यावली भी
कहा गया है।
(छ) गयापत्तलक
यह ग्रन्थ महाकवि ने किसी खास राजा या रानी के आदेश पर किसी का गुनगान करने के
लिए नहीं लिखा है। बल्कि इसका सम्बन्ध सामान्य जनता से है। स्मरणीय तथ्य यह है
कि यहाँ सामान्य जनता से तात्पर्य हिन्दू जनता से है। गया में श्राद्ध एवं
पिण्डदान तथा गया जाकर पितृ ॠण से मुक्त होने से सम्बन्धित महात्म्य की यह लघु
पुस्तिका है।
(ज) विभागसार
यह ग्रन्थ महाराज नरसिंहदेव "दपंनारायण" के आदेश से लिखा गया था। इसमें दायभाग
का संक्षिप्त, किन्तु सुन्दर और आकर्षक विवेचन है। मिथिला के तात्कालीन दायभाग
और उत्तराधिकार सम्बन्धी विधानों के लिए यह एक प्रमाणिक ग्रन्थ है और आज भी
हिन्दू उत्तराधिकार के लिए इसकी प्रमाणिकता अक्षुण्ण है।
|
|