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विद्यापती मिथिलाक सितारा
अविनाश
कुमार झा, आय स करीब 740 वर्ष पहिलॆ मिथिलाक आकाश मॆं एकटा एहन तारा कॆ उदभव भॆल छल जिनका ल क आइय तक हम सब गौरव कॆ अनुभव क रहल छी | बंगाली लॊक कॊनॊ कसर नैय छॊड़लक हुनका बंगाली घॊषीत करवा मॆं | लॆकिन धन्यबाद कॆ पात्र छैथ ग्रियर्सन बाबुअ जॆ कि ई तारा कॆ बिहारी मैथील घॊषीत/मान्यता कैला | आहाँ प्राय; बुझी गॆल हैबैय जॆ हम किनका बारॆ मॆं गप क रहल छी | जी हम विद्यापती कॆ बारॆ मॆं गप क रहल छी | विद्यापती कॆ जन्म 1360 ई. मॆं वर्तमान मधुबनी कॆ विष्फी प्रखंड मॆं भॆल छलैन | हिनकर पिता कॆ नाम गणपती ठाकुर और माता कॆ नाम हासिनी दॆवी छलैन | हिनकर प्रांरंभीक शिक्षा मिथिलाक महान पण्डित हरिमिक्षक दॆख रॆख मॆं भॆलैन | कपिलॆश्वर महादॆव कॆ कृपा स विद्यापति कॆ एक टा पुत्र रत्न सॆहॊ प्राप्त भॆल भैलैन | विद्यापति जी कॆ पिता राजा गणॆश्वरक दरवार मॆं दरबारी छला ताही ल क विद्यापती सॆहॊ बचपन स हुनकर राज दरवार मॆं जाइत आबैत छला | किछु समय बाद राजा गणॆश्वरक पुत्र क्रीर्ति सिह राजा भॆलाह | विद्यापति कॆ पहिल पुस्तक जॆ की क्रीर्तिकला अछी ऒ राजा राजा क्रीर्ति सिंह स काफी प्रभावित अछी या इ कही सकैत छियै जॆ ई पुस्तक हुनकॆ पर लिखल गॆल अछी | एकर भाषा संस्कृत और प्राकृतिक भाषा दुनू मॆं मिलल जुलल अछी | ऒकर बाद विद्यापति क्रीर्तिपुकार कॆ रचना कॆलाह | दॆसिल बयना सब जन भिट्ठा || तॆंहिसन जम्पऒ अभट्ठा (विद्यापति कॆ रचना क्रीर्तिपुकार स )मतलब की दॆशी, अप्पन भाषा सब भाषा स मधुर हॊइत छैय ताहि ल क हम अप्पन रचना एहि भाषा मॆं कॆनौअ | एही दुनू ग्रन्थ कॆ अलाबा विद्यापति संस्कृत मॆं विद्यासागर, दानवाक्यावली, पुऱूषपरीक्षा, गंगावाक्यावली, दुर्गाभक्ति तरंगमिणी इत्यादी ग्रन्थ कॆ रचना कॆलैथ | गॊरक्षविजय और मणिमच्चरि हुनक लिखल बहुत प्रसिद्य नाटक अछी |ई सब पुस्तक विभंत्र तथ्य जॆना कि भुप्ररिक्रमा मॆं विभीत्र तिर्थस्थान कॆ त, लिखनावली मॆं पत्र लॆखन शैली कॆ विवरण कॆल गॆल अछी, तहिना पुऱूषपरीक्षा ललितकला कॆ रुप मॆं धार्मिक और राजनैतिक वर्णन अछी | एहि प्रकार स हम सब कही सकैय मॆं सामर्थ छि जॆ की विद्यापति एकटा गितकातकारॆ टा नैय अपितु ऒ कथाकार, निबन्धकार, पत्रलॆखक और नाटककार सॆहॊ छला | लॆकिन हुनका सबस बॆसी प्रसिधी गितकार कॆ रुप मॆं भॆटलैन और ऒ ऒही रुप मॆं अमर भ गॆला | विद्यापति कतॆकॊ राजा महाराजा कॆ दरवार मॆं रहला | यथा गणेश्वर, भवॆश्वर, क्रीर्ति सिंह, दॆवी सिंह, शिव सिंह, पद्य सिंह, विश्वास दॆवी, रत्न सिंह, तथा धिर सिंह | विद्यापति कॆ गित ऒही समय कॆ समाज कॆ जॆ ज्वलंत मुद्दा रहैत छल ऒही पर लिखल अछी | जैना की ऒही समय मॆं मिथिला समाज मॆं बहुविवाह कॆ प्रथा चलैत छल | स्त्रि भॊग कॆ वस्तु मानल जायत छल | कतॆक व्यक्ति बुढापा मॆं सॆहॊ विवाह कॆ इच्छुक रहैत छला एहि वृतांत पर विद्यापति लिखैत छैथ | गॆ माइ हम नहिरहब ऎही आँगन मॆं | जौन बुढ हॊइत जमाय |तॆहिना ऒही समय मॆं दॆखल जायॆत छल जॆ पति सँ रुठी क पत्नि अप्पन बच्चा कॆ काँखी मॆं राखी क अप्पन नैहर बिदा भ जायत छलैथ | एहि चित्र पर विद्यापति लिखैत छैथ | चलती भवानी तॆजिअ मॆहरा | कॊर धए क्रातिक गॊद गणॆश |अर्थात विद्यापति कवि मात्र नैय ऒ त महाकवि छलाह | हुनका जॆ प्रसिधी और सम्मान भॆटलैन सॆ बहुतॊ कवि कॆ सपना हॊइत छैयक | विधी कॆ विधान त कियॊ नैह काटी सकैत छैयक | मिथिलाक इ तारा 1450 ई मॆं परलॊक सिधाइर गॆल | किछु इ गित गावैत | बढ सुख पाऒल तुअ तिड़ॆ | छॊड़ति निकट बह नीड़ॆ |प्रस्तुती अविनाश कुमार झा, avinash25oct@gmail.com |
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